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कबीर के दोहे: NBSE Class 9 Alternative Hindi (हिन्दी) notes

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Get notes, summary, questions and answers, MCQs, extras, and PDFs of Chapter 1 “कबीर के दोहे (Kabir ke Dohe)” which is part of Nagaland Board (NBSE) Class 9 Alternative Hindi answers. However, the notes should only be treated as references and changes should be made according to the needs of the students.

सारांश (Summary)

इस अध्याय का शीर्षक है “कबीर के दोहे” (Kabir ke Dohe)। इसमें संत कबीर द्वारा रचित कुछ प्रमुख दोहों का संग्रह दिया गया है। कबीर ने अपने दोहों के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों, आडंबरों और झूठे व्यवहारों का विरोध किया है। उन्होंने सीधी, सरल और सटीक भाषा में जीवन के गूढ़ सत्य बताए हैं।

कबीर कहते हैं कि साधु का स्वभाव सूप जैसा होना चाहिए, जो सार्थक बातों को ग्रहण कर ले और व्यर्थ को छोड़ दे। दूसरे दोहे में वे बताते हैं कि साधु का जीवन दूसरों के कल्याण के लिए होता है, जैसे वृक्ष फल नहीं खाते और नदियां पानी नहीं पीतीं। इसी तरह, संत भी अपने लिए नहीं, परोपकार के लिए जीते हैं।

कबीर यह भी कहते हैं कि निंदक को अपने पास रखना चाहिए, क्योंकि वह बिना साबुन और पानी के हमें हमारी कमियों का बोध कराकर हमें निर्मल कर देता है। संसार को सेमल के फूल जैसा बताया गया है, जो दिखने में सुंदर पर अंदर से खोखला होता है, यानी जीवन में व्यर्थ की चीजों पर मोहित नहीं होना चाहिए।

सात समुंदर की स्याही और धरती का कागज भी हरि के गुणों को लिखने के लिए पर्याप्त नहीं है, यह बात कबीर की ईश्वर के प्रति अनन्य भक्ति और असीम श्रद्धा को दर्शाती है। वे यह भी सिखाते हैं कि हमें ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जो दूसरों को शीतलता और शांति प्रदान करे।

संतों के बारे में कबीर कहते हैं कि वे संसार के मोह-माया से दूर रहते हैं और ईश्वर के समक्ष अपने पेट की चिंताओं को नहीं रखते। उनके अनुसार, झूठे व्यक्ति का प्रेम झूठे से ही होता है, और सत्य से उसका संबंध तभी टूटता है, जब वह सत्य को स्वीकार कर लेता है।

कुल मिलाकर, ये दोहे जीवन के मूल्यों, सत्य, ईश्वर भक्ति और समाज के प्रति जिम्मेदारियों पर आधारित हैं।

पंक्ति दर पंक्ति (Line by line) स्पष्टीकरण

साधू ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय। सार सार को गहि रहे थोथा देइ उड़ाय।।

कबीर कहते हैं कि संत का स्वभाव ऐसा होना चाहिए जैसे सूप होता है। सूप वह चीज़ होती है जो अनाज से बेकार चीज़ों को अलग कर देती है। ठीक उसी तरह, एक सच्चा साधु वही ग्रहण करता है जो सही और सार्थक हो, और जो बेकार और अनुपयोगी है, उसे छोड़ देता है।

बृच्छ कबहुँ नहिं फल भरौं नदी न संचै नीर। परमारथ के कारने साधू धरा शरीर।।

कबीर समझाते हैं कि पेड़ कभी अपने लिए फल नहीं रखते, नदियां अपने पानी को कभी जमा नहीं करतीं। इसी तरह, साधु अपने जीवन को दूसरों के कल्याण के लिए जीते हैं, वे दूसरों की सेवा और परमार्थ के लिए धरती पर आते हैं।

निन्दक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय। बिन साबुन पानी बिना निर्मल करे सुभाय।।

कबीर सलाह देते हैं कि निन्दा करने वालों को अपने पास रखना चाहिए, क्योंकि वे हमें बिना साबुन और पानी के साफ और शुद्ध बना देते हैं। निंदक हमारी गलतियों को बताकर हमें सुधरने का अवसर देते हैं।

यह ऐसा संसार है जैसा सेमल फूल। दिन दस के व्यौहार को झूठे रंगि न भूल।।

कबीर दुनिया की तुलना सेमल के फूल से करते हैं, जो बाहर से बहुत आकर्षक होता है, लेकिन अंदर से खोखला होता है। वे समझाते हैं कि यह संसार भी ऐसा ही है, जो दिखने में आकर्षक और सुखमय लगता है, लेकिन असल में यह अस्थायी और क्षणिक है। हमें इसके झूठे मोह में नहीं फंसना चाहिए।

सात समंद की मसि करूँ लेखनि सब बनराय। धरती सब कागद करूँ हरि गुन लिखा न जाय।।

कबीर कहते हैं कि अगर सातों समुद्रों को स्याही बना दूं और सारे जंगलों की लकड़ियों से कलम बना दूं, और पूरी धरती को कागज़ बना दूं, फिर भी मैं भगवान के गुणों को लिख नहीं सकता। भगवान की महिमा अनंत है और उसे शब्दों में बयां करना असंभव है।

ऐसी बानी बोलिये मन का आपा खोय। औरन को सीतल करै आपहु सीतल होय।।

कबीर सुझाव देते हैं कि हमें ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जिससे हमारे अंदर का अहंकार समाप्त हो जाए। हमारी बोली दूसरों को शांति प्रदान करे और हमें भी शांति का अनुभव हो। मृदु और विनम्र भाषा से ही सच्ची शांति मिलती है।

सन्त न बाँधे गाँठरी पेट समाता लेइ। साईं के सनमुख रहे जहँ माँगे तह दे।।

संत अपने साथ किसी प्रकार की संपत्ति या गठरी लेकर नहीं चलते। वे जितना मिल जाता है, उसमें संतुष्ट रहते हैं। वे ईश्वर के सामने हमेशा समर्पित रहते हैं, और जहां भी उनसे कुछ मांगा जाता है, वे बिना संकोच उसे दे देते हैं। उनका जीवन दान और सेवा के लिए होता है।

बिन रखवाले बाहिरा चिड़ियाँ खाया खेत। आधा परधा ऊबरै चेत सके तो चेत।।

कबीर बताते हैं कि जिस खेत का कोई रखवाला नहीं होता, उसे चिड़ियां नष्ट कर देती हैं। इसी तरह, अगर हम अपनी आत्मा की रक्षा नहीं करेंगे, तो हमारा जीवन आधा-अधूरा रह जाएगा। समय रहते हमें चेतना चाहिए और अपने जीवन की रक्षा करनी चाहिए।

झूठे को झूठा मिले दूना बँधे सनेह। झूठे को साँचा मिले तब ही टूटे नेह।।

कबीर कहते हैं कि झूठे व्यक्ति का झूठे से प्रेम अधिक बढ़ता है, क्योंकि वे एक-दूसरे की बातों को सही मानते हैं। लेकिन जब एक झूठे व्यक्ति का सामना सत्य से होता है, तब उसका झूठ का नेह (प्रेम) टूट जाता है और उसे सच्चाई का अहसास होता है।

पाठ्य प्रश्न और उत्तर (textual questions and answers)

मौखिक प्रश्न

1. साधु का स्वभाव कैसा होना चाहिए ?

उत्तर: साधु का स्वभाव ऐसा होना चाहिए जैसे सूप का स्वभाव, जो सार-सार को ग्रहण कर लेता है और व्यर्थ को उड़ा देता है।

2. कबीर के अनुसार मनुष्य को कैसे वचन बोलने चाहिए ?

उत्तर: कबीर के अनुसार मनुष्य को ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जिससे मन का अहंकार समाप्त हो जाए और जो दूसरों को शीतल करे, साथ ही स्वयं भी शीतल हो जाए।

3. झूठे व्यक्ति को किससे अधिक प्रेम होता है ?

उत्तर: झूठे व्यक्ति को झूठे से अधिक प्रेम होता है और जब झूठे को सच्चा मिलता है तब ही उसका प्रेम टूटता है।

4. सन्त क्या करते हैं ?

उत्तर: सन्त गाँठरी नहीं बाँधते और जो पेट में समा जाए, वही ग्रहण करते हैं। वे सदैव साईं के सम्मुख रहते हैं और जहाँ भी माँगते हैं, वहीं उन्हें प्राप्त होता है।

5. कबीर की भाषा क्या है ?

उत्तर: कबीर की भाषा सधुक्कड़ी है, जो सरल, सहज और प्रभावशाली है।

लिखित प्रश्न

1. कबीर ने अपने काव्य में किसका विरोध किया है ?

उत्तर: कबीर ने अपने काव्य में धार्मिक आडंबर, जाति-प्रथा और पाखंड का विरोध किया है।

2. कबीर की रचनाओं के नाम बताइये ?

उत्तर: कबीर की प्रमुख रचनाएँ हैं- बीजक, साखी, रमैनी, और पद।

3. निम्नलिखित पद्यांशों की व्याख्या कीजिये-

(क) सन्त न बाँधे गाँठरी ………. जहँ मागे तह देइ।

उत्तर: यह वाक्यांश कबीर की साखी से लिया गया है।

व्याख्या: इस वाक्यांश में कबीर ने सन्तों की निःस्वार्थ प्रवृत्ति और त्याग के गुणों का वर्णन किया है। सन्त वे होते हैं जो सांसारिक चीज़ों का संग्रह नहीं करते। वे अपने जीवन में आवश्यकता से अधिक वस्त्र, धन, या सामग्री नहीं रखते। उनका पेट ही उनकी थैली होती है, अर्थात वे अपने जीवन के लिए केवल उतना ही रखते हैं, जितना उन्हें तत्कालिक आवश्यकता होती है। सन्तों का उद्देश्य भौतिक संग्रह करना नहीं होता, बल्कि जरूरतमंदों की सेवा करना होता है। कबीर ने यहाँ पर सन्तों के इस गुण की प्रशंसा की है कि जहाँ आवश्यकता होती है, वहाँ वे निःस्वार्थ भाव से दान करते हैं। सन्तों का जीवन एक आदर्श जीवन है, जो समाज को सिखाता है कि मोह-माया के बंधन से मुक्त होकर सेवा और परोपकार करना ही सच्चा धर्म है। कबीर की यह साखी सादगी और निःस्वार्थता का महत्त्व बताती है और यह दर्शाती है कि असली संत वही है जो भौतिक वस्त्रों और धन में बंधा नहीं है।

(ख) झूठे को झूठा मिले ……… तब ही टूटे नेह।

उत्तर: यह वाक्यांश कबीर की साखी से लिया गया है।

व्याख्या: इस वाक्यांश में कबीर ने झूठे व्यक्ति और उसके संबंधों पर गहरा व्यंग्य किया है। कबीर के अनुसार, झूठा व्यक्ति अपने जैसे अन्य झूठे व्यक्तियों से ही अधिक प्रेम करता है, क्योंकि उनके बीच की झूठी मित्रता और स्नेह परस्पर लाभ और स्वार्थ पर आधारित होती है। झूठे व्यक्ति के रिश्ते तभी टिकते हैं जब उन्हें एक-दूसरे से कोई स्वार्थ सिद्ध होता है। लेकिन जब एक सच्चा व्यक्ति उस झूठे व्यक्ति से मिलता है, तब उसका असली रूप प्रकट होता है, और उनकी झूठी मित्रता या प्रेम समाप्त हो जाता है। कबीर ने यहाँ समाज में व्याप्त झूठे और स्वार्थी संबंधों की पोल खोली है और यह समझाने की कोशिश की है कि झूठे रिश्ते लंबे समय तक नहीं टिक सकते। सच्चाई के सामने आने पर ऐसे रिश्ते टूट जाते हैं, क्योंकि वे सच्चाई की कसौटी पर खरे नहीं उतरते।

(ग) सात समंद ……… हरि गुन लिखा न जाय।

उत्तर: यह वाक्यांश कबीर की साखी से लिया गया है।

व्याख्या: इस वाक्यांश में कबीर ने भगवान की महिमा और उनकी अपारता का वर्णन किया है। कबीर कहते हैं कि यदि सात समुद्रों को स्याही बना दिया जाए, सभी जंगलों की लकड़ी से कलम बना दी जाए, और पूरी धरती को कागज बना दिया जाए, तब भी भगवान की महिमा का सम्पूर्ण वर्णन नहीं किया जा सकता। भगवान की महिमा इतनी विशाल और अनंत है कि उसे शब्दों में सीमित नहीं किया जा सकता। यह वाक्यांश हमें यह भी सिखाता है कि मनुष्य की सीमित बुद्धि और भाषा भगवान की अपार शक्ति और गुणों को पूरी तरह से व्यक्त नहीं कर सकती। कबीर के अनुसार, ईश्वर की महिमा अनंत है, और कोई भी सांसारिक साधन या उपकरण इसे पूरी तरह समझने या व्यक्त करने में सक्षम नहीं हो सकता। यह वाक्यांश धार्मिक भक्ति और ईश्वर के प्रति असीम श्रद्धा का प्रतीक है, जो हमें भगवान की सर्वव्यापकता का एहसास कराता है।

4. कबीर का जीवन-परिचय लिखिये।

उत्तर: कबीर का जन्म 1398 में काशी में हुआ था। वे एक प्रसिद्ध संत और कवि थे। उनका पालन-पोषण एक जुलाहा परिवार में हुआ, जो धार्मिक कट्टरता और पाखंड के विरोधी थे। कबीर ने समाज में व्याप्त आडंबरों का विरोध किया और सत्य, सरलता, और प्रेम के मार्ग पर चलने का संदेश दिया। उनकी वाणी में आध्यात्मिकता, भक्ति और ज्ञान का मिश्रण मिलता है। वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के समर्थक थे और उन्होंने ईश्वर को हर व्यक्ति के भीतर देखा। कबीर की मृत्यु 1518 में हुई।

5. संसार की तुलना कबीर ने किससे और क्यों की है ?

उत्तर: कबीर ने संसार की तुलना सेमल के फूल से की है, क्योंकि सेमल का फूल दिखने में बहुत सुंदर होता है लेकिन उसमें कोई वास्तविक गुण या स्थायित्व नहीं होता। इसी प्रकार संसार भी बाहरी रूप से आकर्षक लगता है, परंतु उसका असली रूप अस्थायी और नश्वर है। संसार के भौतिक सुख-समृद्धि के पीछे भागना व्यर्थ है, क्योंकि ये सभी क्षणिक होते हैं।

6. जो निन्दा करता है उसे अपने समीप क्यों रखना चाहिए ?

उत्तर: जो निन्दा करता है उसे अपने समीप इसलिए रखना चाहिए क्योंकि वह बिना साबुन और पानी के हमारे स्वभाव को निर्मल और शुद्ध कर देता है। निन्दक हमारे दोषों को उजागर करता है, जिससे हमें अपनी गलतियों का अहसास होता है और सुधारने का अवसर मिलता है। इसलिए निन्दक को अपना मित्र समझना चाहिए।

अतिरिक्त (extras)

प्रश्न और उत्तर (questions and answers)

1. साधु का स्वभाव कैसा होना चाहिए?

उत्तर: साधु का स्वभाव ऐसा होना चाहिए जैसा सूप सुभाय।

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16. ऐसी बानी बोलिये मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै आपहु सीतल होय।।

उत्तर: इस दोहे में कबीर मधुर वाणी बोलने की महत्ता बताते हैं। उनका कहना है कि व्यक्ति को ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जिससे न केवल दूसरे लोगों को शांति मिले, बल्कि खुद भी शांति का अनुभव हो। जब हम अपने अहंकार को छोड़कर प्रेम और सौहार्द से भरी वाणी बोलते हैं, तो दूसरों के मन में भी शांति और सौम्यता का भाव उत्पन्न होता है। यह दोहा हमें सिखाता है कि क्रोध, अहंकार और कठोरता से दूर रहकर मीठी और सौम्य भाषा बोलनी चाहिए, जो स्वयं और दूसरों के लिए लाभकारी हो।

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

1. साधु का स्वभाव कैसा होना चाहिए?

(क) जैसे सूप
(ख) जैसे वृक्ष
(ग) जैसे नदी
(घ) जैसे पहाड़

उत्तर: (क) जैसे सूप

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10. किसके बिना संत निर्मल स्वभाव के होते हैं?

(क) साबुन और पानी
(ख) धन
(ग) ज्ञान
(घ) तपस्या

उत्तर: (क) साबुन और पानी

Ron'e Dutta
Ron'e Dutta
Ron'e Dutta is a journalist, teacher, aspiring novelist, and blogger who manages Online Free Notes. An avid reader of Victorian literature, his favourite book is Wuthering Heights by Emily Brontë. He dreams of travelling the world. You can connect with him on social media. He does personal writing on ronism.

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